अदिति महाविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन वक्ताओं ने रखे गहरे विचार
सुनील मिश्रा नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत अदिति महाविद्यालय एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "भारत विभाजन की साहित्यिक अभिव्यक्ति" के दूसरे दिन आज विचारों का सरगम का शमा बांधा गया।आईसीएसएसआर द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी में देश के जाने-माने विद्वानों ने देश के विभाजन पर अपने विचार रखे।महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. नीलम राठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कल के कार्यक्रम की झलकियाँ साझा कीं
मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय कुलपति, बाबासाहेब आंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने कहा, "जिस देश के आकाश में शांति के बादलों का मेला बजता था, वहीं आज भी विभाजन की त्रासदी हमें सोचने पर मजबूर करती है। वहीं प्रो. मज़हर आसिफ़ कुलपति, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने अपने उद्बोधन में भाषा, बोली और संस्कृति के अंतर को समझाते हुए कहा कि इक़बाल की शायरी बंटवारे के पहले और बाद में कैसे बदल गई, यह अपने आप में एक शोध है। प्रो. महेशचंद शर्मा अध्यक्ष, एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास संस्थान ने कहा कि विभाजन पर अभी लिखा जाना बाकी है, अभी वह पूरी तरह सामने नहीं आया। उन्होंने 1909 के पृथक इलेक्ट्रोल से लेकर मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट तक का सफर दिखाया। श्रीधर पराड़कर साहित्यकार एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संरक्षक ने कहा कि भारत विभाजन को केवल ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि गहरी मानवीय त्रासदी के रूप में प्रस्तुत किया। साथ ही ज्योति जला निज प्राण की, “देश बाँट गया” और “विभाजित” जैसी पुस्तकों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि साहित्य विभाजन की सच्चाइयों और मानवीय संवेदनाओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
विभिन्न साहित्यकार साहित्य परिक्रमा के संपादक इंदू शेखर तत्पुरुष, इग्नू के प्रो नरेंद्र मिश्र, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के विभिन्न पदाधिकारी, अदिति महाविद्यालय के शिक्षक एवं छात्रगण देख के विभिन्न भागो से आए शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। प्रांत कार्यवाहक दिल्ली प्रदेश अनिल गुप्ता ने विभाजन के बारे में विभाजन की त्रासदी, पीड़ा और स्वयं सेवकों के योगदान के बारे में और भविष्य की भावी पीढ़ी को बताया। वरिष्ठ साहित्यकार रतन चंद्र सरदाना जी। मैं उस त्रासदी को महसूस करने भोगने तथा देखने वाले में से एक हो तथा मैं 7 वर्ष का बालक था। उन्होंने अपने आपबीती से जोड़ते हुए विभाजन को याद किया और भविष्य की युवा पीढ़ी को संदेश दिया कि भविष्य में सजग और सतर्क रहें ताकि की भारत को दोबारा ऐसा विभीषण वाला त्रासदी को देखना ना पड़े। कार्यक्रम के अंत में प्रो. सुनीता बहमनी ने सभी अतिथियों, शिक्षकों और छात्राओं का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर प्रो.नीलम राठी प्राचार्या अदिति महाविद्यालय, प्रो.अवनिजेश अवस्थी, डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष संपादक,साहित्य परिक्रमा,
डॉ.पवनपुत्र बादल महामंत्री,अखिल भारतीय साहित्य परिषद् आदि लोग उपस्थित थे।
Comments
Post a Comment